दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 34 साल पुराने रिश्वत केस में दो इंजीनियर बरी
Updated: April 2026 | By News Desk
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नई दिल्ली: एक अहम और भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 34 साल पुराने रिश्वत मामले में दो इंजीनियरों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने के आरोप को साबित करने में असफल रहा और संदेह का लाभ आरोपियों को दिया गया।
यह मामला 20 सितंबर 1991 का है, जब सहायक अभियंता वीके दत्ता और जूनियर इंजीनियर दिनेश गर्ग पर कथित रूप से लंबित बिल जारी कराने के बदले क्रमशः 1800 और 900 रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। शिकायत के आधार पर सीबीआई ने ट्रैप बिछाकर दोनों को गिरफ्तार किया था और 2002 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया था।
हालांकि, वर्षों बाद हाईकोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई करते हुए अभियोजन पक्ष के दावों में कई खामियां और विरोधाभास पाए। बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि गवाहों के बयानों में असंगति, प्रक्रियात्मक त्रुटियां और ठोस सबूतों की कमी के कारण यह मामला कमजोर है।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार घटना के समय दोनों आरोपी कार्यस्थल पर मौजूद थे, जिससे आरोपों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। इसके अलावा विभागीय गवाह ने भी बताया कि उस समय किसी प्रकार का भुगतान लंबित नहीं था, जिससे रिश्वत मांगने का कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आया।
मामले में एफआईआर दर्ज करने के समय को लेकर भी संदेह जताया गया, क्योंकि रिकॉर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता के सीबीआई कार्यालय पहुंचने और एफआईआर दर्ज होने का समय लगभग एक ही बताया गया। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष ने कुछ महत्वपूर्ण गवाहों को पेश नहीं किया और बरामद रकम को लेकर भी विरोधाभासी बयान सामने आए।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल पैसे की बरामदगी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि रिश्वत मांगने का ठोस प्रमाण न हो। अदालत ने कहा कि मजबूत संदेह भी ठोस सबूत का स्थान नहीं ले सकता।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने 2002 के फैसले को रद्द करते हुए दोनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया और उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। यह फैसला 34 साल तक चले लंबे कानूनी संघर्ष का अंत है और यह दर्शाता है कि न्याय केवल ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही दिया जा सकता है, भले ही इसमें समय क्यों न लगे।
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