दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘किराया भरने’ केजरीवाल के बयान को कानूनी वादा मानने से इनकार
Updated: April 2026 | By NCR Adarsh News Desk

नई दिल्ली: कोरोना महामारी के मुश्किल दौर में किए गए वादों और उम्मीदों के बीच अब एक बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि संकट के समय प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया गया कोई बयान कानूनी तौर पर बाध्यकारी वादा नहीं माना जा सकता।
यह मामला उस वक्त से जुड़ा है जब देशभर में लॉकडाउन लागू था और लाखों लोग आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। 29 मार्च 2020 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मकान मालिकों से अपील की थी कि वे गरीब किराएदारों से किराया न मांगें। इस बयान ने कई जरूरतमंद लोगों के लिए उम्मीद की किरण जगाई थी।
बाद में पांच दिहाड़ी मजदूर अदालत पहुंचे और उन्होंने दावा किया कि सरकार ने उनके किराए का भुगतान करने का वादा किया था। जुलाई 2021 में एक सिंगल जज बेंच ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सरकार से जवाब मांगा था और इसे लागू करने की संभावना जताई थी।
हालांकि, लंबे कानूनी संघर्ष के बाद अब डिवीजन बेंच ने इस फैसले को पलट दिया है। अदालत ने कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया गया बयान केवल एक अपील थी, न कि कोई ऐसा वादा जिसे अदालत लागू करवा सके। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार किसी नीति के तहत मदद करना चाहती है या नहीं, यह उसका अधिकार है, लेकिन अदालत उसे ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि ऐसे किसी वादे के आर्थिक और व्यावहारिक पहलुओं पर स्पष्टता नहीं थी। अदालत ने माना कि यह बयान एक असाधारण परिस्थिति में दिया गया था, जिसे कानूनी दायित्व में नहीं बदला जा सकता।
इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने 2021 के सिंगल जज के आदेश को रद्द कर दिया और मामले का निपटारा कर दिया। यह निर्णय उन सभी मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है, जहां भावनात्मक परिस्थितियों में दिए गए बयानों को कानूनी रूप देने की कोशिश की जाती है।
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